पुराने संदूक की वो आखिरी चिट्ठी

​शहर की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, आज बरसों बाद मुझे अपने पुराने घर जाने का मौका मिला। वही धूल भरी गलियाँ और वही पुराना लकड़ी का दरवाज़ा, जो आज भी खुलने पर वैसी ही चरमराहट की आवाज़ करता था जैसे बचपन में करता था।
​घर के स्टोर रूम की सफाई करते वक्त मेरी नज़र एक पुराने लोहे के संदूक पर पड़ी। उसे खोलते ही कागजों की एक सोंधी सी महक कमरे में फैल गई। सबसे नीचे दबा हुआ एक लिफ़ाफ़ा मिला, जिस पर लिखा था— "शायद कभी कह सकूँ।"
​वह चिट्ठी मेरी माँ ने मेरे नाम लिखी थी, लेकिन कभी मुझे दी नहीं।
​उसमें लिखा था:
"बेटा, आज जब तुम शहर जा रहे थे, तो मन किया कि तुम्हें गले लगा लूँ और कहूँ कि मत जाओ। पर तुम्हारी आँखों में बड़े सपनों की जो चमक थी, उसने मेरी ज़ुबान सिल दी। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी ममता तुम्हारे पंखों की बेड़ी बन जाए। तुम सोचते होगे कि माँ को फर्क नहीं पड़ता, पर तुम्हारी खाली कुर्सी को देखकर आज भी मेरी चाय का प्याला ठंडा रह जाता है।"
​चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखों से एक आँसू टपक कर उस कागज़ पर गिरा और शब्दों को थोड़ा धुंधला कर गया। मुझे अहसास हुआ कि हम अपनी 'दास्तां' लिखने और सुनाने में इतने मशगूल हो जाते हैं कि अपनों की 'खामोश दास्तां' पढ़ना ही भूल जाते हैं।
​आज माँ नहीं है, पर उस कागज़ के टुकड़े ने मुझे अहसास करा दिया कि सबसे खूबसूरत कहानियाँ अक्सर वो होती हैं, जो कभी कही ही नहीं गईं।
​क्या आपको यह कहानी पसंद आई? अगर आप चाहें तो मैं इसे थोड़ा और लंबा कर सकता हूँ या किसी और विषय (जैसे दोस्ती या अधूरा प्यार) पर लिख सकता हूँ।

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